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अनोखी शादी:हिमालय से ऊंचा अंकित का साहस,बने श्वेता का उजाला,त्रियुगीनारायण मंदिर में सात फेरे

किलिमंजारो की चोटी से शुरू हुआ प्रेम, अंततः शिव-पार्वती के विवाह स्थल, त्रियुगीनारायण मंदिर में सात फेरों के साथ पूरा हुआ

ARUNA MANVAR

अनोखी शादी: देहरादून, उत्तराखंड, कहते हैं कि.. जोड़ियां ऊपर बनती हैं कौन कब कहां मिलेगा ये सब है उसके दम से रौशन उसकी रज़ा के बगैर पत्ता भी नहीं खड़कता.. भगवान साक्षात तो मदद करने धरती पर किसी की आते नहीं लेकिन वो चुन जरूर लेते हैं माध्यम ताकि आस्था और विश्वास जैसे शब्द हमेशा धरती पर जिंदा रहें। कुछ ऐसी ही कहानी अंकित और श्वेता की शादी की है, ये कहानी दो इंसानों के दांपत्य जीवन में बंधने की नहीं है बल्कि ये कहानी है आस्था समर्पण और विश्वास के सात फेरों की.

अनोखी शादी -प्रेम कहानी संघर्ष, साहस और अटूट विश्वास

उत्तराखंड रुद्रप्रयाग के त्रियुगीनारायण मंदिर में हाल ही में संपन्न हुई एक शादी उसने विवाह के बंधन को सर्वोच्च पवित्रता का पर्याय बना दिया। ये कहानी है पर्वतारोही श्वेता सिंह और अंकित की, जिनकी प्रेम कहानी संघर्ष, साहस और अटूट विश्वास से भरी है।

जहां एक ओर अंकित देहरादून के क्लेमेंट टाउन के रहने वाले एक पेशेवर पर्वतारोही हैं, वहीं उनकी जीवन संगिनी श्वेता दिल्ली की रहने वाली हैं। श्वेता, जो महज़ 10 साल की उम्र में एक दवा के रिएक्शन के कारण अपनी आँखों की रोशनी खो चुकी थीं, उन्होंने अपनी इस कमी को कभी अपनी नियति नहीं बनने दिया। उनकी शादी का स्थान, भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का साक्षी रहा त्रियुगीनारायण मंदिर, अपने आप में इस जोड़े के दृढ़ संकल्प की गवाही दे रहा था।

चुनौतियों को बनाया ताकत

श्वेता की ज़िंदगी में अंधकार तब छा गया जब उनकी उम्र महज़ 10-11 साल थी। पर इस शारीरिक बाधा ने उनके मन के ‘कुछ कर गुजरने के जज्बे’ को और मजबूत कर दिया। उन्होंने हालात को मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया। दिल्ली के एक ब्लाइंड स्कूल में दाखिला लेने के बाद उन्होंने अपनी एक इंद्री की कमी को अन्य क्षमताओं को दुगना करके पूरा किया। इसी साहस के दम पर उन्होंने 10वीं कक्षा में दिल्ली नॉर्थ जोन में टॉप किया और तत्कालीन दिल्ली के मुख्यमंत्री से ‘इंदिरा गांधी पुरस्कार’ प्राप्त किया।

स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई (रामजस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक) पूरी करने के बाद श्वेता के मन में हमेशा कुछ नया करने की चाहत रही। एक प्रकृति प्रेमी होने के नाते, उन्हें घूमना और ट्रेकिंग करना बहुत पसंद था। उनका सपना था पहाड़ों पर चढ़ना, लेकिन उनकी शारीरिक स्थिति के कारण किसी भी एडवेंचर संस्थान ने उन्हें दाखिला नहीं दिया। ‘विकलांगता नीति’ न होने का हवाला देकर हर जगह उन्हें निराशा हाथ लगी।

विश्वास की डोर और अंकित का साथ

साल 2025 में, इंडियन माउंटेनिंग फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में श्वेता की मुलाकात उत्तराखंड के पेशेवर पर्वतारोही अंकित से हुई। जब श्वेता को हर तरफ से मायूसी मिल रही थी, तब अंकित ने उनमें भरोसा जगाया। उन्होंने श्वेता को माउंटेनिंग की ट्रेनिंग दी, उन्हें प्रेरित किया, बुनियादी तकनीकें सिखाईं और हर कदम पर उनका साथ देने का वादा किया।

अंकित के विश्वास और श्वेता के हौसले का नतीजा यह हुआ कि हाल ही में दोनों ने मिलकर अफ्रीका महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो को फतह किया।

किलिमंजारो से त्रियुगीनारायण तक

ये उपलब्धि केवल एक ट्रेकिंग का समापन नहीं थी, बल्कि उनके रिश्ते की एक नई शुरुआत थी। किलिमंजारो की बर्फीली चोटी पर ही दोनों ने अपने इस रिश्ते को जीवन भर के बंधन में बदलने का फैसला किया और वहीं सगाई कर ली।

उन्हें न इतिहास बनाना था ना ख़बर बल्कि उन दोनों को एक दूसरे का साथ निभाना था

किलिमंजारो की चोटी से शुरू हुआ प्रेम, अंततः शिव-पार्वती के विवाह स्थल, त्रियुगीनारायण मंदिर में सात फेरों के साथ पूरा हुआ। श्वेता और अंकित की शादी साबित करती है कि प्रेम और सच्चा साथ मिल जाए, तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती और जीवन का अंधकार भी प्रकाश में बदल जाता है।

PHOTO -Social Media

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