Champawat News :धरातल पर उतर रहा आत्मनिर्भर उत्तराखंड का विजन, आईटीबीपी वाहिनी को सीधे भेजी जा रही स्थानीय सब्जियां और फल

Champawat News चम्पावत,मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के विजन को धरातल पर उतारते हुए जिला उद्यान विभाग चम्पावत ने स्थानीय काश्तकारों को सशक्त बनाने की एक बेहतरीन पहल की है। इसके तहत भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की लोहाघाट स्थित 36वीं वाहिनी को स्थानीय स्तर पर उत्पादित ताजी सब्जियों और फलों की दूसरी बार सफलतापूर्वक सीधी आपूर्ति की गई है।
मुख्यमंत्री का हमेशा से यह स्पष्ट विजन रहा है कि सीमांत क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और एक मजबूत विपणन व्यवस्था विकसित की जाए। इसी दूरदर्शी सोच को साकार करते हुए इस कदम से जहां सीमा पर तैनात जवानों को शुद्ध व पौष्टिक आहार मिल रहा है, वहीं स्थानीय काश्तकारों को एक बड़ा और स्थाई बाजार भी नसीब हुआ है।
आमतौर पर सैन्य बलों में रसद की आपूर्ति बाहरी ठेकेदारों और बिचौलियों के माध्यम से होती है, जिससे स्थानीय किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पाता था। उद्यान विभाग चम्पावत ने सीधे आईटीबीपी प्रशासन से संपर्क कर इस नई व्यवस्था की नींव रखी, जिसके तहत बीते उनतीस मई और अठारह जून दो हजार छब्बीस को आईटीबीपी की मांग पर क्रमशः ग्यारह सौ पैंसठ किलोग्राम और इतीस सौ बीस किलोग्राम ताजी सब्जियां व फल बिना किसी बिचौलिये के सीधे वाहिनी तक पहुँचाए गए। इससे बिचौलियों का कमीशन पूरी तरह समाप्त हो गया है और किसानों को उनके उत्पादों का शत-प्रतिशत और सही मूल्य मिल रहा है।
मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप पूरे राज्य को ‘ऑर्गेनिक स्टेट’ बनाने की दिशा में चम्पावत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यहाँ बिना रासायनिक खादों के उगाई गई ताजी सब्जियां सीधे जवानों तक पहुँच रही हैं, जो सीधे तौर पर रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने की सरकार की नीति का हिस्सा है।
वर्तमान में आईटीबीपी की कुल मांग की पच्चीस प्रतिशत आपूर्ति स्थानीय स्तर से हो रही है, जिसे भविष्य में शत-प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। जिला प्रशासन अब मुख्यमंत्री के ‘स्मार्ट और आत्मनिर्भर जनपद’ के विजन के तहत इसे एक स्थाई मॉडल के रूप में विकसित कर रहा है, ताकि आने वाले समय में अन्य सैन्य चौकियों को भी इससे जोड़ा जा सके। उद्यान विभाग की यह पहल साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से स्थानीय काश्तकारों को आत्मनिर्भर बनाकर पहाड़ों के पानी और जवानी को यहीं सहेजा जा सकता है।



