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श्वेता त्रिपाठी:मसान की शालू से लेकर मिर्जापुर की गोलू तक श्वेता का फिल्मी सफर,’लड़कियों को दबंग होना चाहिए’: श्वेता का ‘गोलू गुप्ता’ के किरदार पर बेबाक बयान

श्वेता त्रिपाठी मसान की शालू से लेकर मिर्जापुर की गोलू तक :कभी-कभी आपकी एक इमेज आपकी पहचान बन जाती है या यूं कहें कि फिल्मी हस्तियों द्वारा निभाया गया कोई किरदार बरसों तलक लोगों को तो याद रहता ही है.. लेकिन उस आर्टिस्ट की पूरी पर्सनेलिटी के साथ वह पहचान के रूप में जीवन भर चस्पा हो जाता है… इस किरदार से कलाकार को निकलने में काफी दिन लग जाते हैं कभी-कभी तो मनोवैज्ञानिक रूप से किरदार और कलाकार आपस में इतने घुल मिल जाते हैं कि लोग असल नाम से ना पुकार कर..कर फिल्म में दिए गए नाम से जानने लग जाते हैं… ऐसा ही कुछ हुआ
मसान जैसी रियलिस्टिक फिल्म में श्वेता त्रिपाठी के किरदार शालू के साथ लोग अभी उनकी मसान को दिल से लगा कर बैठे ही थे लेकिन कुछ दिनों बाद लोगों के दिमाग में मिर्जापुर की गोलू गुप्ता घूमने लग गयीं… देहरादून में तीन दिनों के लिए फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया इस फेस्टिवल में बॉलीवुड की तमाम हस्तियों ने शिरकत की इस मौके पर मीडिया बॉक्स के संपादक मनीष चंद्रा ने मिर्जापुर फेम दबंग गर्ल गोलू गुप्ता यानी कि एक्ट्रेस श्वेता त्रिपाठी से कुछ इस तरह से बातचीत की शुरुआत की…मसान फिल्म की सोशल स्टडी के दौरान हमने कई लोगों से बात करी उन सब ने एक बात कही एक्टिंग वो होती है जो एक्टिंग बिल्कुल ना लगे… सचमुच आपने समाज की उस विडंबना को जिया था… फिर उसके बाद निकल कर गोलू आई.. अपने किरदारों के इतने जीवंत शेड्स कहां से लाती हैं आप…

श्वेता त्रिपाठी से जब हमने पूछा कि लोग आपको किस नाम से बुलाना ज़्यादा पसंद करते हैं—गोलू, श्वेता या कोई और नाम इस पर हंसते हुए श्वेता ने कहा कि
अलग-अलग लोग अलग-अलग नामों से बुलाते हैं! बहुत से लोग मुझे ‘गोलू’ कहते हैं, कुछ ‘श्वेता’ कहते हैं, तो कई लोग ‘गोलू दीदी’ भी कहते हैं। वहीं कुछ लोग मुझे ‘बटाटा बड़ा’ भी बुलाते हैं, क्योंकि मेरा सोशल मीडिया हैंडल (@batatabada) वही है। लेकिन अगर घर की बात करूँ, तो घर पर सब मुझे प्यार से ‘पिंकी’ बुलाते हैं।

श्वेता त्रिपाठी – उत्तराखंड फिल्मों के लिये नेचुरल आई लैंस .. देहरादून में आलू गुटके की सब्जी खाना मेरे लिए अमेजिंग एक्सपीरियंस

श्वेता के पिता एक आईएएस अधिकारी रहे हैं इस कारण उनकी स्कूली शिक्षा कई अलग-अलग जगहों पर हुई है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को लेकर श्वेता ने बताया अंडमान की यादें मेरे दिल के बेहद करीब हैं। जब मेरे पिता जी का ट्रांसफर वहाँ हुआ था, तब मैं लगभग 5वीं से 7वीं कक्षा में थी। उस उम्र में बच्चों पर पढ़ाई या बोर्ड एग्ज़ाम का कोई भारी प्रेशर नहीं होता था। वहाँ पहली बार मैंने डाइविंग की, समंदर को करीब से देखा और प्रकृति के बीच रहने का जो अहसास और आज़ादी महसूस की, वह अद्भुत थी। वे तीन साल मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन और कीमती सालों में से एक रहे हैं। वैसे मेरी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली, अंडमान, हैदराबाद और मुंबई जैसी अलग-अलग जगहों पर हुई, जिससे मुझे नई जगहों और संस्कृतियों को समझने का मौका मिला। श्वेता देहरादून फिल्म फेस्टिवल में शिरकत करने आई तो उन्होंने कहा देखिए उत्तराखंड की जो नेचुरल ब्यूटी है इसकी जो संस्कृति है वो एक नेचुरल आई लेंस है आप यहां पर बगैर कैमरा के यहां की संस्कृति यहां का खान-पान यहां की ताजगी को न सिर्फ महसूस कर सकते हैं बल्कि शाश्वत रूप से उसे अपनी कहानी का रूप दे सकते हैं.. उत्तराखंड फिल्मों के कल्चर को आगे बढ़ाने में हमेशा कामयाब रहा है और ये बहुत अच्छी बात है कि यहां की सरकार फिल्मों की शूटिंग को लेकर फिल्म विकास की नीतियों को लेकर काफी लचीली और सपोर्टिव है.. सरकार के साथ-साथ यहां के लोग भी कलाकारों को सिक्योर महसूस कराते हैं… और हां अगर खान-पान की बात करें तो मैंने इससे पहले कभी भी आलू के गुटके नहीं खाए थे मुझे उसका स्वाद इतना अमेजिंग लगा कि मैं उसे शब्दों से बयां नहीं कर सकती हूं…

'लड़कियों को दबंग होना चाहिए': श्वेता त्रिपाठी का 'गोलू गुप्ता' के किरदार पर बेबाक बयान,मिर्जापुर की गोलू गुप्ता से लेकर मसान की शालू तक श्वेता का फिल्मी सफर

NIFT से फ़ैशन डिज़ाइनिंग और फिर जर्नलिज्म के अनुभव पर


श्वेता ने कहा कि मैंने निफ़्ट से फ़ैशन डिज़ाइनिंग की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ (फ़िल्मफ़ेयर/फ़ेमिना) में इंटर्नशिप और जॉब की। कॉलेज के दिनों में ही मुझे कई बड़े सेलेब्रिटीज से मिलने, उनसे बातें करने और उन्हें कवर करने का मौका मिला। आपको बताऊँ, फ़िल्म ‘ओम शांति ओम’ के रिलीज़ होने से पहले मैंने दीपिका पादुकोण का इंटरव्यू लिया था, अनुष्का शर्मा के डेब्यू से पहले उनके फ़ोटोशूट कवर किए थे। 2007 में फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स के दौरान मैं रेड कार्पेट पर हाथ में कैमरा लेकर बतौर फ़ोटोग्राफ़र खड़ी होती थी.. उन सारे अनुभवों ने मुझे ज़मीन से जुड़े रहना और कैमरे के दोनों तरफ की दुनिया को समझना सिखाया.. निफ़्ट (NIFT) में सीखी गई डिज़ाइनिंग एक एक्टर के रूप में कितने काम आती है इस बारे में श्वेता ने बताया वो समझ आज बहुत काम आती है। हम इंसानों में विज़ुअल सेंसर्स बहुत स्ट्रॉन्ग होते हैं। डिज़ाइन बैकग्राउंड होने की वजह से जब मुझे कोई स्क्रिप्ट मिलती है, तो मैं अपने किरदार के कपड़े, उनका टेक्सचर, कलर और पैटर्न आसानी से अपने दिमाग में विज़ुअलाइज़ कर पाती हूँ। मेरा मकसद कभी सिर्फ़ पर्दे पर ‘सुंदर’ दिखना नहीं रहा, बल्कि मेरा ध्यान इस बात पर रहता है कि मैं उस किरदार जैसी लगूँ और उसे पर्दे पर एकदम सच्चा बना सकूँ।

थियेटर और एक्टिंग की ओर आपका कदम कैसे बढ़ा? क्या परिवार की तरफ से इसके लिए पूरा सपोर्ट था?

श्वेता – घर से मुझे और मेरी बहन को हमेशा बहुत प्रोत्साहन मिला। बचपन से ही मम्मी-पापा ने हमें कभी खाली नहीं बैठने दिया—आर्ट क्लास, भरतनाट्यम, कत्थक और यहाँ तक कि शियामक डावर की डांस क्लास में भी भेजा। जब मैं निफ़्ट के तीसरे साल में थी, तब मैंने पापा से कहा कि मुझे एक्टिंग में करियर बनाना है। पापा ने बस एक ही बात कही—”तुम जो भी करो, उसकी पढ़ाई और उसे गहराई से सीखना बहुत ज़रूरी है…”उस समय निफ़्ट की पढ़ाई सुबह होती थी, और शाम को मैं सिरी फोर्ट (दिल्ली) में ड्रामा और थियेटर की वर्कशॉप्स लेती थी, जिन्हें NSD की पूर्व डायरेक्टर डॉ. अमाल अल्लाना ने डिज़ाइन किया था। सुबह निफ़्ट का काम और शाम को थियेटर का रियाज़—उस मेहनत ने मुझे गढ़ा है।AI के बढ़ते चलन पर श्वेता बेहद मजबूती से बोलता है कि जब मैं किसी कॉलेज में स्टूडेंट्स से पूछती हूँ कि ‘आपमें से कितने लोग किताबें पढ़ते हैं?’ और बहुत कम हाथ उठते हैं, तो मुझे सच में बहुत दुख होता है। आज हम फोन्स और स्क्रीन में इतना उलझ गए हैं कि हमारा अपना दिमाग़ आलसी और डल होता जा रहा है। मेरा मानना है कि आप AI का इस्तेमाल अपनी सहूलियत के लिए ज़रूर करें, लेकिन उसकी वजह से अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करना बंद न करें। किताबें पढ़ना, नई चीज़ें सीखना और सोचना इंसान के मानसिक विकास और संवेदनशीलता के लिए बेहद ज़रूरी है।

क्या आपने अपने करियर में काम चुनते समय कुछ ख़ास नियम या सिद्धांत तय किए हैं?

श्वेता त्रिपाठी -हाँ, बिल्कुल! डिस्नी चैनल के शो क्या मस्त है लाइफ से मेरी फुल-टाइम एक्टिंग की शुरुआत हुई थी। करियर की शुरुआत में जब मेरे पास पैसों की तंगी थी, तब भी मैंने तय किया था कि मैं कभी भी फेयरनेस (गोरेपन के) प्रोडक्ट्स का विज्ञापन नहीं करूँगी, क्योंकि मैं रंग के आधार पर भेदभाव में बिल्कुल विश्वास नहीं रखती। इसके अलावा मैं अनहेल्दी फ़ास्ट फ़ूड के विज्ञापनों से भी दूर रहती हूँ। पैसे ज़रूरी हैं, लेकिन अपने संस्कारों और नैतिक सिद्धांतों के साथ समझौता करके कमाया गया पैसा मुझे मंज़ूर नहीं है।

फिल्म ‘मसान’ में शालू के चिता वाले दृश्य की शूटिंग के दौरान आपके दिमाग और दिल में क्या चल रहा था?

श्वेता – वो मेरी ज़िंदगी का बेहद भावुक और भारी क्षण था। जब कैमरा ऑन भी नहीं था, तब भी मेरी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। शालू और दीपक की मासूम प्रेम कहानी का वह अंत इतना दर्दनाक था कि सेट पर मौजूद हर इंसान का दिल टूट रहा था। मौत एक ऐसी सच्चाई है जहाँ इंसान के पास कोई स्कोप नहीं बचता—कहानी वहीं हमेशा के लिए ख़त्म हो जाती है। उस पल में जो अधूरापन और अपनों को खोने का दर्द था, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था।

तमिल फ़िल्म ‘मेहंदी सर्कस’ में काम करना और खुद उसकी डबिंग के बारे में बताते हुए श्वेता ने कहा कि तमिल मेरे लिए एक बिल्कुल नई भाषा थी, लेकिन मैंने मेहनत करके भाषा सीखी और फ़िल्म में खुद अपनी डबिंग की। मेरा मानना है कि किसी भी किरदार की आत्मा उसकी आवाज़ में होती है। जब पर्दे पर चेहरा आपका है, तो आवाज़ भी आपकी ही होनी चाहिए ताकि किरदार में सजीवता और गहराई महसूस हो।

‘मिर्ज़ापुर’ में ‘गोलू गुप्ता’ जैसे दमदार और कठोर किरदार में ढलना कितना चुनौतीपूर्ण रहा इस पर श्वेता त्रिपाठी का कहना है कि गोलू की ज़िंदगी में बहुत दुख, नुकसान और संघर्ष है। उसने अपने अपनों को खोया है, अपने सीधे-सादे सपनों को टूटते देखा है। मिर्ज़ापुर की वो दुनिया पुरुषों के वर्चस्व, हथियारों और हिंसा से भरी हुई है। उस माहौल में सिर्फ़ टिके रहने के लिए गोलू को अपने दिमाग, बल और रणनीतियों का इस्तेमाल करना पड़ता है। वो सिर्फ़ एक किरदार नहीं है, बल्कि एक औरत की सर्वाइवल (अस्तित्व) की लड़ाई है।

OTT प्लेटफॉर्म्स और सिनेमाघरों (थियेटर) की रिलीज़ की चर्चा को लेकर श्वेता ने कहा कि OTT का सबसे बड़ा फ़ायदा उसकी पहुँच (Reach) है। लोग दुनिया के किसी भी कोने से, अपनी सहूलियत के हिसाब से बेहतरीन कंटेंट देख सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ, थियेटर में जाकर फ़िल्म देखना एक अलग ही कम्युनिटी एक्सपीरियंस (सामूहिक अनुभव) होता है। जब ‘मिर्ज़ापुर’ का स्पेशल थियेटर एक्सपीरियंस रखा गया था, तो बड़े पर्दे पर सीटी और तालियों का जो मज़ा था, उसकी तुलना किसी चीज़ से नहीं हो सकती। मेरा मानना है कि दर्शकों की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अच्छे सिनेमा को सपोर्ट करें। अगर दर्शक अच्छी और अर्थपूर्ण फ़िल्मों को सिनेमाघरों में जाकर देखेंगे, तभी मेकर्स को भी वैसा अच्छा कंटेंट बनाने का हौसला मिलेगा।

हनुमान अंश की सफलता पर श्वेता ने कहा कि बिल्कुल इस तरह की फिल्म और सब्जेक्ट का स्पेस लोगों के बीच में था इसलिए आज भी लोगों को भक्ति और आस्था की कहानियाँ पसंद आ रही हैं उन्होंने कहा कि मुझे भी ये फिल्म जरूर देखनी है.. साथ ही मैं ये भी कहती हूं कि यहां की संस्कृति पर यहां के खानपान पर और भी फिल्में बननी चाहिए और बनती रहनी चाहिए संवेदनाओं और भावनाओं का सकारात्मक संचार रुकना नहीं चाहिए….

Manish Chandra

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