दुधवा टाइगर रिजर्व में मिला दुर्लभ कॉमन ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक,कैमरे में हुआ कैद
ऐसा सांप देखा नहीं होगा

लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। यहां पक्षी गणना के दौरान एक अत्यंत दुर्लभ कॉमन ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक देखा गया है। इस अनोखे जीव की मौजूदगी ने विशेषज्ञों और वन विभाग के अधिकारियों को रोमांचित कर दिया है।
पक्षी सर्वे के दौरान मिली बड़ी सफलता
यह दुर्लभ सर्प उस समय दिखाई दिया जब नाजरुन निशा बेलरायां रेंज के घास के मैदानों में पक्षियों का सर्वे कर वापस लौट रही थीं। वन्यजीवों और विशेषकर सांपों की प्रजातियों में गहरी रुचि रखने वाली नाजरुन की नजर अचानक इस जीव पर पड़ी। उन्होंने बिना देर किए इस दुर्लभ सर्प की तस्वीरें और वीडियो अपने कैमरे में सुरक्षित कर लिए। बाद में जब विशेषज्ञों द्वारा इस जीव का गहन अध्ययन किया गया, तो इसकी पहचान कॉमन ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक के रूप में हुई। जानकारों के मुताबिक, इस सर्प का शरीर काफी पतला होता है और इसका रंग तांबे जैसा चमकीला भूरा होता है, जो इसे अन्य सांपों से अलग पहचान देता है।
पर्यावरण संतुलन में निभाता है अनूठी भूमिका
कॉमन ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जीवनशैली है, जो पूरी तरह पेड़ों पर आधारित होती है। पेड़ों की टहनियों के बीच बिजली की गति से चलने और खुद को वातावरण के अनुकूल ढालने में यह माहिर होता है। यह सर्प स्वभाव से शांत होता है और आमतौर पर इंसानों के प्रति आक्रामक नहीं होता। पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह छिपकलियों और छोटे कीटों का शिकार कर उनकी आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे जंगल का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है।

स्वस्थ जंगल और समृद्ध जैव विविधता का प्रतीक
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जंगल में इस प्रजाति का पाया जाना वहां के स्वस्थ और समृद्ध वन पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण है। नाजरुन निशा ने इस खोज को अपने करियर का सबसे सुखद अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी खोजें न केवल व्यक्तिगत रूप से प्रेरणा देती हैं, बल्कि भविष्य में शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी मददगार साबित होती हैं। गौरतलब है कि नाजरुन पूर्व में भी मगरमच्छ, मॉनीटर लिजर्ड और कई खतरनाक सांपों के सफल रेस्क्यू ऑपरेशन कर चुकी हैं।
वन अधिकारियों ने थपथपाई फील्ड स्टाफ की पीठ
दुधवा टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक जगदीश आर. ने इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए इसे बेहतर संरक्षण प्रयासों का परिणाम बताया। वहीं मुख्य वन संरक्षक एवं फील्ड निदेशक डॉ. एच. राजामोहन ने फील्ड स्टाफ की सजगता की सराहना की है। उन्होंने कहा कि गश्त के दौरान वन्यजीवों पर रखी जा रही बारीक नजर के कारण ही ऐसे दुर्लभ जीव सामने आ रहे हैं। ये प्रयास भविष्य में वन्यजीवों के दस्तावेजीकरण और उनके संरक्षण की रणनीति बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होंगे।



