ओशो की बात माननी पड़ी , एग्जामिनर ने दिए 99 नंबर, ‘भारतीय दर्शन’ की परिभाषा को ही दे डाली चुनौती !
ओशो को 100 में से 99 अंक दिए
ओशो की बात माननी पड़ी:क्या दर्शनशास्त्र की कोई ‘राष्ट्रीयता’ हो सकती है? क्या ‘भारतीय दर्शन’ और ‘पाश्चात्य दर्शन’ जैसे भेद वाकई मायने रखते हैं? इन गहरे सवालों पर आचार्य श्री रजनीश ओशो ने अपने विद्यार्थी जीवन का एक अविस्मरणीय प्रसंग साझा किया है, जो शिक्षा, ज्ञान और मौलिक चिंतन पर एक नई बहस छेड़ता है।ओशो की बात माननी पड़ी, यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक सच्चे जिज्ञासु ने किताबी ज्ञान की सीमाओं को तोड़कर सत्य की नई परिभाषा गढ़ी।
परीक्षा का अनोखा किस्सा-ओशो की बात माननी पड़ी
ओशो बताते हैं कि एम.ए. की अंतिम परीक्षा में उनके शिक्षक ने उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि वे केवल वही लिखें जो किताबों में दर्ज है, भले ही उन्हें वह गलत लगे। शिक्षक जानते थे कि उनका प्रिय शिष्य लीक से हटकर सोचता है, और हुआ भी वही। ओशो ने वही लिखा जो उन्हें सही लगा। लिखित परीक्षा तो किसी तरह निपट गई, लेकिन असली चुनौती मौखिक परीक्षा में थी।
अलीगढ़ के प्रोफेसर और दर्शन की नई परिभाषा
मौखिक परीक्षा के लिए अलीगढ़ विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष आए थे। ओशो के शिक्षक ने उन्हें फिर समझाया कि अब वे ‘किताबी’ जवाब दें, क्योंकि मामला उनके हाथ में नहीं था।
प्रश्न था: “भारतीय दर्शन की क्या विशिष्टता है?”
ओशो का जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने तुरंत पलटकर पूछा, “दर्शन भी भारतीय और अभारतीय हो सकता है?”
उनके प्रोफेसर पास में ही बैठे थे और घबराहट में उन्हें पैर से इशारा करने लगे, कुर्ता खींचने लगे, लेकिन ओशो ने बिना विचलित हुए अपनी बात रखी। उन्होंने प्रोफेसर को सीधे बताया कि वे जवाब कैसे दें जब उनके अपने शिक्षक उन्हें परेशान कर रहे हैं!
“दर्शन तो दर्शन है, दृष्टि का भेद कैसा?”
ओशो ने उस दिग्गज प्रोफेसर के सामने तर्क रखा कि दर्शन का अर्थ केवल ‘दृष्टि’ है। यदि ‘देखने’ की बात है, तो क्या सफेद चमड़ी वाला देखे या काली चमड़ी वाला, क्या इससे देखने के तरीके बदल जाएंगे? उन्होंने बुद्ध और हेराक्लाइटस, पार्श्वनाथ और पाइथागोरस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन आँखों वालों ने भी देखा है, उन्होंने एक ही सत्य देखा है, चाहे वे पूरब के हों या पश्चिम के।
ओशो ने जोर देकर कहा कि दर्शनशास्त्र में केवल ‘दृष्टाओं’ यानी आँख वालों की गिनती होनी चाहिए, अंधों की नहीं। और यदि आँख वालों की बात करें, तो उन्होंने हमेशा एक ही सत्य देखा है।
अप्रत्याशित परिणाम: 99 अंक और एक अमूल्य सीख
ओशो के प्रोफेसर को लगा कि अब परीक्षा हाथ से गई, लेकिन अलीगढ़ के उन बुजुर्ग प्रोफेसर को यह बात बेहद पसंद आई। उन्होंने कहा, “मैंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था कि यह भेद ठीक नहीं है। हमने तो मान ही लिया है कि भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन…।”

प्रोफेसर ने स्वीकार किया कि ओशो का उत्तर किताब का नहीं था, लेकिन वह बिल्कुल सही था। ओशो की बात माननी पड़ी उन्होंने ओशो को 100 में से 99 अंक दिए। जब ओशो ने एक अंक कटने का कारण पूछा, तो प्रोफेसर ने जो कहा वह और भी अद्भुत था: “तुम्हारी गलती के लिए नहीं काटा है, यह तो केवल अपनी रक्षा के लिए कि लोग सोचेंगे कि मैंने पक्षपात किया है, सौ के सौ दे दिए! सौ ही देने चाहिए। मुझे क्षमा करो, दिए नहीं जाते। सौ ही दिए जाने चाहिए, मगर दिए नहीं जाते नियम से। अगर मैं सौ के सौ दे दूं तो ऐसा लगेगा कि कुछ पक्षपात किया है, इसलिए निन्यानबे दे रहा हूं।”
ओशो का संदेश: मौलिकता और सत्य की खोज
यह प्रसंग केवल एक परीक्षा का किस्सा नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली, रूढ़िवादी सोच और सत्य की खोज पर एक गहरा संदेश है। ओशो ने अपने इस अनुभव से दर्शाया कि सच्चा ज्ञान किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह मौलिक चिंतन और साहस से पैदा होता है। यह घटना आज भी शिक्षाविदों और विद्यार्थियों को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में ज्ञान के भेदों से परे जाकर सत्य को देख पा रहे हैं।
Article/ Reference – Social media
Photo – GEMINI



