आई दिवाली आई कैसे उजाले लाई, आई है दिवाली सुनो जी घरवाली
सिल्वर स्क्रीन और दीये: हिंदी फिल्मकारों ने परदे पर कैसे दिखाई दीपावली
मनीष चंद्रा
(फिल्म प्रशंसक त्रिभुवन कुमार राजू के संस्मरणों पर आधारित)
एक वो भी दीवाली थी,
एक ये भी दीवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है,
रोता हुआ माली है
एक वो भी दीवाली थी,
एक ये भी दीवाली है
दिवाली;दिवाली के लिए सबसे मकबूल गीत फिल्म नजराना का जिसमें राज कपूर ने इस गीत को बखूबी निभाया था.. भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पाठशाला और आर्काइव भारतीय हिंदी फिल्म सिनेमा जिसने भारत के प्रत्येक त्योहारों संस्कृति धर्म प्रतीकों को कहानी और अपनी रचना धार्मिता से जिया है.. फिर वह चाहे कोई भी परंपरा या उत्सव हो.. मीडिया बॉक्स बात कर रहा है दीपावली के फिल्मांकन का
जब परदे पर गूंजी दीवाली की रौनक: क्लासिक फिल्मों का स्वर्णिम दौर
दीपावली सिर्फ दीपों, पटाखों और मिठाइयों का पर्व नहीं है, बल्कि ये रिश्तों को जोड़ने, दिलों की दूरियां मिटाने और जीवन में नई उम्मीद की किरण जगाने का पावन अवसर है। जब बात भारतीय संस्कृति के इस सबसे बड़े पर्व की हो, तो हिंदी सिनेमा भला इससे अछूता कैसे रह सकता है। हिंदी सिनेमा के शुरुआती और स्वर्णिम दौर से लेकर आज तक, परदे पर दीवाली की चमक, उसकी उमंग और कभी-कभी इन खुशियों के बीच छिपे तन्हाई के दर्द को बेहद संवेदनशीलता के साथ समेटा गया है।
भारतीय फिल्म इतिहास के शुरुआती दशकों में, विशेषकर 1940 और 1950 के दशक के सुनहरे दौर में, फिल्मों के जरिए त्योहारों को सामाजिक एकता और पारिवारिक मूल्यों के प्रतीक के रूप में दिखाया गया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की सादगी से लेकर रंगीन और भव्य आधुनिक सेटिंग्स तक, परदे पर जलने वाले वे छोटे-छोटे दीये आज भी हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवंत रखते हैं।
जब परदे पर गूंजी दीवाली की रौनक: क्लासिक फिल्मों का स्वर्णिम दौर
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने पर फिल्में बननी शुरू हुईं, तो त्योहारों का मंचन कहानियों का एक अहम हिस्सा बन गया। इस दौर की फिल्मों में दीवाली के दृश्यों को बेहद आत्मीयता के साथ फिल्माया जाता था। नायक-नायिका का दीये जलाना, एक-दूसरे को गले लगाना और घर के आंगन में रंगोली सजाना, उस समय के भारतीय समाज के पारिवारिक मिलन का सटीक दस्तावेज हुआ करता था।
1940 और 50 के दशक की कई ऐसी फिल्में रहीं, जिन्होंने त्योहारों के इस सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत किया:
खजांची (1941): शमशाद बेगम की जादुई आवाज में सजा गीत ‘दिवाली फिर आ गई सजनी…’ भारतीय सिनेमा के शुरुआती दीवाली गीतों में विशेष स्थान रखता है।
किस्मत (1943): बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले बनी इस ऐतिहासिक फिल्म में अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज में गूंजा गीत ‘घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा…’ उत्सव के बीच अकेलेपन के दर्द को बयां करता है।
रटन (1944): जोहराबाई अंबालेवाली का गाया गीत ‘आई दिवाली, आई दिवाली, दीपक संग नाचे पतंगा…’ इस कड़ी में एक और क्लासिक उदाहरण है।
खुशियों के बीच तन्हाई: उत्सव और अंतर्द्वंद्व का संगम
हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह हर उत्सव के सिक्के के दोनों पहलुओं को दिखाता है। जहां एक ओर दीवाली रोशनी और उल्लास का प्रतीक है, वहीं कई क्लासिक फिल्मों में इसे अकेलेपन, बिछोह और अपनों की याद के दर्द को बयां करने के लिए भी एक सशक्त माध्यम बनाया गया।
परदे पर जब नायक या नायिका दीवाली की जगमगाती रोशनी के बीच अपने परिवार से दूर किसी महानगर में अकेले नजर आते हैं, तो आतिशबाजी की आवाज और आसमान में छूटते रंगों के बीच दिल का सूनापन दर्शकों को अंदर तक झकझोर देता है। इस विरोधाभास ने हिंदी सिनेमा में दीवाली के दृश्यों को केवल सतही मनोरंजन से ऊपर उठाकर एक गहरी कलात्मक ऊंचाई दी है।
इस दौर की अन्य प्रमुख फिल्मों में त्योहारों के मार्मिक और उल्लासपूर्ण दोनों रूप देखने को मिले:
- पगड़ी (1948):आई दिवाली दीप दीप जला जा…’ (गायक: शमशाद बेगम, गीता दत्
- ताज (1956): ‘जहान में आई दिवाली बड़े चिराग जले…’ (गायक: लता मंगेशकर)
- अब दिल्ली दूर नहीं (1957): ‘यह चमन हमारा अपना है, इस देश पे अपना राज है…’ (गायक: आशा भोंसले)
- खजांची (1958): ‘आई दिवाली आई, कैसे उजाले लाई…’ (गायक: आशा भोंसले)
- पैगाम (1959):’कैसे दिवाली मनाए ओ लाला, अपना तो बारह महीने दिवाला…’ (गायक: मोहम्मद रफ़ी) – यह गीत आम आदमी के जीवन की विडंबना को अनूठे अंदाज में पेश करता है।
- नजराना (1961):इस फिल्म में दो अलग-अलग परिस्थितियों को दर्शाते हुए दो खूबसूरत गीत रखे गए — ‘मेले हैं चिरागों के, रंगीन दिवाली है…’ (लता मंगेशकर) और ‘एक वो भी दिवाली थी एक यह भी दिवाली है…’ (मुकेश)।
- हरियाली और रास्ता (1962): ‘लाखों तारे आसमान में एक मगर ढूंढे न मिला…’ (गायक: मुकेश, लता मंगेशकर)
- लीडर (1964):’दिवाली आई रे आई घर घर दीप जले…’ (गायक: आशा भोंसले)
दशकों का सफर और आधुनिक उत्सव
समय के साथ फिल्मों का कैनवास बड़ा होता गया और नब्बे के दशक के बाद पारिवारिक मेलोड्रामा व भव्य सेटिंग्स का दौर आया। त्योहार अब केवल पृष्ठभूमि नहीं रहे, बल्कि कहानी का एक अहम हिस्सा बन गए।
इस सफर में कई बेहतरीन और लोकप्रिय गीतों ने सिल्वर स्क्रीन की रौनक बढ़ाई:
दिल दौलत दुनिया (1972): ‘दीप जले देखो…’ (गायक: आशा भोंसले, उषा मंगेशकर)
जुगनू (1973):छोटे छोटे नन्हे मुन्हे प्यारे प्यारे रे…’ (गायक: किशोर कुमार)
शिर्डी के साई बाबा (1977): ‘दीपावली मनाई सुहानी दीपावली…’ (गायक: आशा भोंसले)
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया (2001):’आई है दिवाली, सुनोजी घरवाली…’ (गायक: उदित नारायण, कुमार शानू, अल्का याग्निक, स्नेहा पंत) – आधुनिक दौर में त्योहार की मस्ती और पारिवारिक नोकझोंक को दर्शाता एक ऊर्जावान गीत।
ये सिल्वर स्क्रीन का ही जादू है कि आज भी जब कोई फेस्टिव सीजन आता है, तो सिनेमा के ये पुराने और सुनहरे पन्ने हमारी यादों में जगमगाने लगते हैं, और परदे के वे दीये असल जिंदगी के दीपों के साथ मिलकर हमारी संस्कृति को और अधिक रोशन कर देते हैं।
Photo Gemni AI



