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बिहार चुनाव में BJP ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ फॉर्मूला: CM नीतीश कुमार का भविष्य क्या?

BJP ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ फॉर्मूला : बिहार विधानसभा चुनाव में BJP ने 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि NDA में वह अब भी जूनियर पार्टनर है। महागठबंधन की अंदरूनी कलह के बीच, बीजेपी ने कैसे प्लानिंग, माइक्रो मैनेजमेंट और संगठनात्मक मज़बूती के दम पर यह शानदार जीत हासिल की? क्या नीतीश कुमार अब भी 5 साल के लिए मुख्यमंत्री बने रहेंगे?

BJP ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ फॉर्मूला -बीजेपी की ऐतिहासिक जीत का समीकरण

बिहार चुनाव परिणाम ने सभी को चौंका दिया, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने सोशल बेस का विस्तार करते हुए 89 सीटें जीतीं। यह 1962 में जनसंघ के 3 सीटों से खाता खोलने के 63 साल बाद पार्टी का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी की इस सफलता के पीछे तीन प्रमुख कारक थे:

  1. उत्कृष्ट प्लानिंग: चुनाव से महीनों पहले ही ज़मीनी स्तर पर रणनीति बनाना।
  2. माइक्रो मैनेजमेंट: छोटी से छोटी ज़िम्मेदारियों (हेलिकॉप्टर, आवास, खान-पान) के लिए कार्यकर्ताओं की तैनाती।
  3. मज़बूत सांगठनिक ढाँचा: 24×7 काम करने वाला कैडर।

माइक्रो मैनेजमेंट की रणनीति: बीजेपी ने ‘फेसलेस’ यानी बिना किसी बड़े चेहरे के, हज़ारों कार्यकर्ताओं के दम पर यह जीत दर्ज की। पार्टी ने नागपुर से आए कार्यकर्ताओं को भी दलित और मुस्लिम बस्तियों में संवाद के लिए भेजा, जो बताता है कि संगठन हर वर्ग तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था।

बूथ मैनेजमेंट और प्रवासी बिहारी कनेक्शन

बीजेपी की जीत में संगठन की मज़बूती और बूथ स्तर पर प्रबंधन का बड़ा हाथ रहा।

  • चुनावी रणनीति के प्रमुख: धर्मेन्द्र प्रधान, सीआर पाटिल और केशव प्रसाद मौर्य ने ओबीसी वोटर्स को साधने और जीत की रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।
  • बूथ कैटेगराइजेशन: सीआर पाटिल की अगुवाई में हर बूथ को A, B, C, D चार कैटेगरी में बाँटा गया। इससे पार्टी ने अपनी ऊर्जा उन बूथों पर लगाई जहाँ मतदाताओं को अपने पक्ष में करना आसान था।
  • प्रवासी बिहारी साधने की रणनीति: पार्टी ने जुलाई से ही देशभर के राज्यों में प्रवक्ता और पदाधिकारियों को भेजा, जहाँ बिहारी बड़ी संख्या में रहते हैं। इन्हें छठ और दीपावली के लिए बिहार आकर अच्छी सरकार के लिए वोट देने का आग्रह किया गया। ‘बिहारी प्रवासी संघ’ ने डेटा बैंक का काम किया, जिससे यह काम आसान हो गया।

महिला वोटर्स पर फोकस और सप्त सखी

राज्य के महिला वोटिंग पैटर्न को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने महिला केंद्रित स्ट्रैटजी पर काम किया।

  • महिला कार्यकर्ताओं की तैनाती: पाँच राज्यों (छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली) से 200 महिला कार्यकर्ताओं को बिहार भेजा गया।
  • शक्ति केंद्र और सप्त सखी: 5 बूथों को मिलाकर शक्ति केंद्र बनाए गए, जो महिलाओं के साथ छोटी बैठकें करते थे। हर बूथ पर ‘सप्त सखी’ (7 महिलाओं का समूह) बनाया गया, जिन पर महिलाओं को मतदान केंद्र तक लाने की ज़िम्मेदारी थी।
  • योजनाओं का प्रचार: पक्का घर, शौचालय, उज्ज्वला योजना जैसी केंद्र और राज्य की योजनाओं का ज़ोरदार प्रचार किया गया।

RSS का सहयोग और कैडर की ताक़त

  • कैडर बेस्ड पार्टी: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी की सफलता की बड़ी वजह उसका मज़बूत कैडर है, जो आरजेडी और जेडीयू जैसी पार्टियों में नहीं है।
  • आरएसएस (RSS) की भूमिका: स्वयंसेवकों ने ‘लोकमत परिष्कार’ के नाम पर छोटी-बड़ी बैठकें कीं, जहाँ सीधे तौर पर वोट माँगने के बजाय राष्ट्रहित में मतदान (हिंदुत्व की राजनीति करने वाले को मतदान) पर ज़ोर दिया गया।
  • नाराज़ कार्यकर्ताओं को मनाना: गृह मंत्री अमित शाह ने निर्दलीय खड़े होने वाले नाराज़ कार्यकर्ताओं (जैसे अलीनगर सीट पर संजय कुमार सिंह) से बातचीत करके उनकी नाराज़गी दूर की।

CM नीतीश कुमार का भविष्य और गठबंधन का गणित

इस जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब तक अपने पद पर बने रहेंगे, और NDA गठबंधन में ज्यादा सीटें लाकर भी बीजेपी कब तक जूनियर पार्टनर बनी रहेगी?

  • राजनीतिक गणित: एनडीए में जेडीयू को हटा दें तो बीजेपी, हम, एलजेपी(आर) और आरएलएम ने मिलकर 107 सीटें जीती हैं। यह दिखाता है कि बिहार की सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी की जेडीयू पर निर्भरता कम हुई है।
  • विश्लेषकों की राय: बीजेपी तब तक जूनियर पार्टनर रहेगी जब तक आरजेडी नहीं टूटती और लोकसभा में जेडीयू सांसद बने रहते हैं। जिस दिन बीजेपी इन दोनों को अपने पक्ष में कर लेगी, वह अपने बलबूते पर अपना सीएम बनाएगी।

इतिहास की बात: बीजेपी की मातृसंस्था जनसंघ ने 1962 में बिहार में खाता खोला था। 1996 से समता पार्टी (जेडीयू) के साथ गठबंधन रहा है। पार्टी के ‘भीष्म पितामह’ कहे जाने वाले कैलाशपति मिश्र ने भी गठबंधन पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए ‘नेतृत्व के विकास पर बुरा असर’ पड़ने की आशंका जताई थी। 13 साल बाद बीजेपी ने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है।

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