Main Slideबॉलीवुड बॉक्स

बॉबी देओल की फिल्म बंदर ने दिखाई समाज और सिस्टम की कड़वी सच्चाई

बॉलीवुड डेस्क

अनुराग कश्यप के निर्देशन में बनी फिल्म बंदर एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जो दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ गंभीर सामाजिक सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है। यह फिल्म उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है जो यथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक दबाव वाली कहानियों को पसंद करते हैं। फिल्म एक ऐसे फिल्मी सितारे के पतन की कहानी है जो कानूनी पेचीदगियों और सोशल मीडिया ट्रायल के बीच बुरी तरह फंस जाता है। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आज के दौर में सार्वजनिक धारणा और न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार की परतों को भी बेनकाब करती है।

कहानी का केंद्र समीर मेहरा है, जिसका किरदार बॉबी देओल ने निभाया है। समीर एक गिरता हुआ फिल्म स्टार है जो अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की जद्दोजहद में लगा है। इसी बीच उसकी पूर्व प्रेमिका द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप उसकी जिंदगी में तूफान ला देते हैं। इसके बाद शुरू होता है एक हाई-प्रोफाइल कानूनी केस, जिसमें अदालत के फैसले से पहले ही सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया अपना फैसला सुनाने लगती है। फिल्म दिखाती है कि कैसे सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है और सार्वजनिक राय न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करने लगती है।

अभिनय की बात करें तो बॉबी देओल इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी हैं। उन्होंने एक टूटे हुए और संघर्षरत व्यक्ति के किरदार को बेहद ईमानदारी और गहराई के साथ पर्दे पर उतारा है। सान्या मल्होत्रा ने अपने कम समय के स्क्रीन अपीयरेंस में भी गहरी छाप छोड़ी है। सबा आजाद और सपना पब्बी ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है, जबकि जितेंद्र जोशी का अभिनय हर दृश्य में प्रभावी नजर आता है। राज बी. शेट्टी और इंद्रजीत सुकुमारन की रॉ एक्टिंग फिल्म को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

अनुराग कश्यप का निर्देशन इस बार काफी संयमित और परिपक्व दिखाई देता है। उन्होंने कहानी को सनसनीखेज बनाने के बजाय उसके मनोवैज्ञानिक पक्ष और पात्रों पर पड़ने वाले दबाव पर ध्यान केंद्रित किया है। फिल्म के जेल और कोर्ट वाले दृश्य काफी वास्तविक लगते हैं, जो दर्शकों को सहज महसूस नहीं होने देते। अनुराग ने जानबूझकर कहानी का कोई सरल अंत नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने दर्शकों को ही स्थिति का जज बनने के लिए छोड़ दिया है।

तकनीकी पक्ष पर सिनेमैटोग्राफी बहुत सशक्त है। जेल के दृश्यों को जिस तरह से फिल्माया गया है, वह वहां के भारी माहौल और घुटन को महसूस कराता है। फिल्म का संगीत कहानी के मूड के साथ पूरी तरह न्याय करता है और तनावपूर्ण दृश्यों में बेचैनी को बढ़ाने का काम करता है। हालांकि, संपादन के स्तर पर फिल्म दूसरे भाग में थोड़ी लंबी महसूस हो सकती है, जिससे कहानी की गति कुछ धीमी पड़ जाती है।

फिल्म के मजबूत पहलुओं में बॉबी देओल का बेहतरीन प्रदर्शन, यथार्थवादी कहानी और सोशल मीडिया ट्रायल का सटीक चित्रण शामिल है। वहीं, इसकी धीमी गति और स्पष्ट नैतिक निष्कर्ष का न होना कुछ दर्शकों को अखर सकता है। संक्षेप में, यदि आप एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे और समाज के कड़वे सच से रूबरू कराए, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए। व्यावसायिक फिल्मों की तरह सुखद अंत चाहने वाले दर्शकों के लिए शायद यह फिल्म उपयुक्त न हो। विशेषज्ञों की राय में यह फिल्म ढाई से तीन घंटे के एक ठोस प्रभाव के साथ दर्शकों के जेहन में बनी रहती है।

Related Articles

Back to top button