Dharmendra : एक धरमेंदर और एक समंदर…
धर्मेंद्र के अंदर माटी की खुशबू और संस्कारों की विरासत थी जो आज भी उनके परिवार में कायम है.....

मनीष चंद्रा
Dharmendra :खबरों की ज़ल्दबाज़ी में कुछ ख़बर उन्मादी चैनलों ने धरम पा को 8 दिन पहले ही श्रद्धांजलि दे डाली थी, लेकिन 24 नवंबर को आखिर विदाई का वो दिन आ ही गया जिसने न सिर्फ सिने प्रेमियों को बल्कि मनोरंजन जगत के साथ ही पूरे भारत की आंखें नम कर दीं।
Dharmendra लुधियाना के नरसाली गांव
पंजाब के लुधियाना के नरसाली गांव का वो शख्स मुंबई पहुंचकर एक्टिंग के आसमां का एक सहज और मुकम्मल सितारा.. अब हमारे बीच नहीं है ,ये ख़बर हमारे दिल को अब साल रही है।
धर्मेंद्र खुद भी कहते थे कि वो एक जज्बाती इंसान हैं और इसी जज्बाती इंसान की पूरी शख्सियत अगर आपको देखनी हो तो आप उनकी सन 1969 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म सत्यकाम उठा कर देख लें ये फिल्म हर सत्यवादी इंसान को स्क्रीन से आखिरी सीन तक हटाने नहीं देती है। धर्मेंद्र वास्तव में दिल से ही इतने जज्बाती इंसान थे। वो खुद कहते थे कि वो मोहब्बत बांटते और मोहब्बत लूटते हैं। कविता ,शायरी न सिर्फ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में शुमार था बल्कि वो ज़ेहनी तौर पर भी बहुत कोमल और संजीदगी और इंसानियत से भरे इंसान थे।

धरम जी ने जिन दिलीप कुमार जी की फिल्म शहीद क्लास नाइंथ में चोरी से देखकर हीरो बनने का मन बनाया था , एक दिन उन्हीं दिलीप कुमार साहब ने बकौल एक इंटरव्यू में सायरा बानो के उन्होंने कहा था कि
जब मैने धरम को देखा तो मैने खुदा से कहा तुमने मुझे इतना खूबसूरत क्यों नहीं बनाया
धर्मेंद्र की शख्सियत में आप आडंबर कभी नहीं पाओगे इस मुस्कुराते हुए चेहरे में सेलिब्रिटी वाला एटीट्यूड कभी नहीं रहा। वो जिस किसी से भी मिलते बस उसी के होकर रह जाते।
जरा सोच कर देखिए धर्मेंद्र आपको बिल्कुल भी अपने घर के जैसे ही किसी शख्स की तरह ही हंसने हंसाने वाले कविताएं शायरी एक्टिंग और गुदगुदाने वाले जैसे ही लगेंगे। आज के हीरो जब शर्टलेस होकर आते हैं तो बहुत कम लोगों को पता होगा फिल्मों में पहली अगर किसी हीरो ने शर्ट उतार कर “ही मैन” की छवि अपने नाम की थी तो धर्मेंद्र ही थे और ये फिल्म थी फूल और पत्थर .
धर्मेंद्र की एक अलग छवि प्रस्तुत करती हुई फिल्म इसके बारे में हम सबको जानना काफी आकर्षक लगेगा वो थी रामानंद सागर की आंखें जिसमें पहली बार हिंदी सिनेमा के किसी जासूसी किरदार को गढ़ा गया था, वहीं आप गुद गुदाने वाला कैरक्टर फिल्म चुपके चुपके के प्रोफेसर परिमल.. अनुपमा का गंभीर लेखक न जाने कितनी ऐसी फिल्में हैं जो आपको धर्मेंद्र की खबरों में अब पढ़ने और सुनने को मिल रही होंगी।
धर्मेंद्र को इस फिल्म इंडस्ट्री ने कभी कोई अवार्ड नहीं दिया था लेकिन जब उन्हें फिल्म फेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया तो वो भावुक हो उठे थे।
भारत सरकार ने सन 2012 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित करके धर्मेंद्र की प्रतिभा के साथ कुछ तो न्याय किया।
इंडिया टीवी के धर्मेंद्र स्पेशल न्यूज़ शो में उनको याद करते हुए मशहूर फिल्म लेखक संपादक पंकज शुक्ला ने कहा कि जब धर्मेंद्र मशहूर हो गए तो जब लोग मुंबई आते थे तो सिर्फ उनका एक ही मकसद होता था एक धर्मेंद्र और दूसरा समंदर को देखना। पंकज शुक्ला ने ये भी बताया कि उन दिनों धर्मेंद्र के बंगले के बाहर भी काफी भीड़ लगा करती थी लेकिन वो अपने इसी पंजाबी अंदाज में लुंगी और कुर्ते में आकर सबके गले मिला करते थे।
इतने बेबाक धर्मेंद्र बेहद नरम थे कूद जाऊंगा फांद जाऊंगा गांव वालों अपने दिलों में याद करते रहिए अपने धरम को
मीडिया बॉक्स की श्रद्धांजलि
PHOTO – google



