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Editorial mbi: ‘हरित आर्थिकी’ की ओर उत्तराखंड के बढ़ते कदम

उत्तराखंड के पास वह 'ग्रीन गोल्ड' है जिसकी पूरी दुनिया को तलाश है

Manish Chandra

Green economy: उत्तराखंड की पहचान अब तक केवल ‘देवभूमि’ और ‘पर्यटन प्रदेश’ के रूप में रही है, लेकिन हाल ही में मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन की अध्यक्षता में हुई बैठक ने एक नई इबारत लिखने का संकेत दिया है। राज्य सरकार अब अपनी प्राकृतिक संपदा—विशेषकर वनों और स्वच्छ वातावरण—को ‘कार्बन क्रेडिट’ (Carbon Credit) के माध्यम से एक बड़े राजस्व स्रोत में बदलने की तैयारी कर रही है। यह न केवल राज्य की आर्थिकी के लिए मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि सतत विकास (Sustainable Development) के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भी एक साहसिक कदम है।

Green economy पारिस्थिकी और अर्थव्यवस्था का संतुलन

हिमालयी राज्यों के सामने हमेशा से यह चुनौती रही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कार्बन क्रेडिट वह माध्यम है, जहाँ पर्यावरण संरक्षण सीधे तौर पर आर्थिक लाभ से जुड़ जाता है। मुख्य सचिव का यह निर्देश कि ‘विभाग अपने-अपने कार्यक्षेत्र में संभावनाएं तलाशें’, यह दर्शाता है कि सरकार अब केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि संरक्षण के बदले मिलने वाले अंतरराष्ट्रीय ‘ग्रीन बोनस’ ,Green economy पर भी अपनी दावेदारी ठोक रही है।

इलेक्ट्रिक परिवहन और वन पंचायतें: दो मजबूत स्तंभ

लेख में दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो उत्तराखंड की कार्बन रणनीति को मजबूती देते हैं:

  1. परिवहन में क्रांति: 1,000 इलेक्ट्रिक बसों का संचालन केवल प्रदूषण कम करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह कार्बन उत्सर्जन में कटौती का एक ठोस दस्तावेजी प्रमाण (Proof of reduction) है, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जा सकता है।
  2. सामुदायिक भागीदारी: वन पंचायतों और पैक्स (PACS) को इस मुहिम से जोड़ना मास्टरस्ट्रोक है। इससे कार्बन क्रेडिट का लाभ केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गांवों और स्थानीय समुदायों तक पहुंचेगा, जिससे ग्रामीण आर्थिकी सशक्त होगी।

चुनौतियां और राह

यद्यपि यह विजन सराहनीय है, लेकिन इसकी राह में कुछ तकनीकी चुनौतियां भी हैं। कार्बन क्रेडिट अर्जित करना और उसे वैश्विक बाजार में बेचना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें सटीक डेटा और अंतरराष्ट्रीय मानकों की आवश्यकता होती है। पर्यावरण विभाग को नोडल एजेंसी बनाना और एक ‘नॉलेज पार्टनर’ (विशेषज्ञ एजेंसी) की नियुक्ति का निर्णय इसी जटिलता को सुलझाने की दिशा में सही कदम है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड के पास वह ‘ग्रीन गोल्ड’ है जिसकी पूरी दुनिया को तलाश है। यदि राज्य सरकार इलेक्ट्रिक बसों, सौर ऊर्जा और सघन वनीकरण के माध्यम से कार्बन फुटप्रिंट कम करने में सफल होती है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है जो अपनी Green economy ,शुद्ध हवा और हरियाली से बजट का एक बड़ा हिस्सा जुटाएगा। अब समय आ गया है कि ‘इकोनॉमी’ और ‘इकोलॉजी’ को अलग-अलग देखने के बजाय, उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाया जाए।

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