उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक: नहीं रहे दीवान सिंह कनवाल,थम गई कुमाऊं की आवाज़

मनीष चंद्रा
अल्मोड़ा: उत्तराखंड की लोक संस्कृति और कुमाऊंनी संगीत जगत के लिए बुधवार की सुबह एक अत्यंत दुखद खबर लेकर आई। ‘कुमाऊं की आवाज’ कहे जाने वाले प्रसिद्ध लोकगायक और वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी दीवान सिंह कनवाल का 65 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने अल्मोड़ा के खत्याड़ी स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। दीवान दा पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे और हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार भी चला था।
पहाड़ की सादगी और लोकधुनों को अपनी पहचान बनाने वाले दीवान सिंह कनवाल पिछले साढ़े तीन दशकों से संगीत जगत में सक्रिय थे। उनके गीतों में उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू और आम जनमानस का दर्द झलकता था। जिला सहकारी बैंक से सेवानिवृत्त होने के बाद वे पूरी तरह से लोकगीतों के सृजन और संरक्षण में समर्पित हो गए थे।
दीवान सिंह कनवाल के कुछ बेहद लोकप्रिय गीत, जो आज भी हर उत्तराखंडी की जुबां पर रहते हैं:
दाज्यू हमार जवाई रिषे ग्ये…
आज कुछे मैत जा…
द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनी में…
ह्यू भरी डाना…
कस भिड़े कुनई पंडित ज्यू…

उनके निधन की सूचना मिलते ही पूरे सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके पैतृक आवास से उनकी अंतिम यात्रा बेतालेश्वर घाट के लिए रवाना हुई, जहाँ राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। दीवान कनवाल अपने पीछे अपनी वृद्ध माता, दो पुत्र और दो पुत्रियों का परिवार छोड़ गए हैं। उनकी धर्मपत्नी का निधन पहले ही हो चुका था।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रसिद्ध लोक कलाकार के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि दीवान सिंह कनवाल ने उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और संगीत को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जाना उत्तराखंड की लोक कला और सांस्कृतिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
क्षेत्र के कलाकारों और प्रशंसकों ने ‘दीवान दा’ को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके जाने से कुमाऊंनी लोक संगीत का एक स्वर्ण युग समाप्त हो गया है, लेकिन उनके गीत आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा मार्गदर्शक बने रहेंगे।
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