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Sandhya Shantaram:दिग्गज अभिनेत्री और नृत्यांगना का निधन,’नवरंग’ और ‘पिंजरा’ से मिली अमर पहचान

इतनी मधुर लय ताल और थिरकन फिर कभी देखने को ना मिली...

CHANDRA MANISH

Sandhya Shantaram:मुंबई ,हिंदी फिल्मों के दीवानों को 1963 में आई सेहरा फिल्म का ‘पंख होते तो उड़ आती रे‘ गीत याद होगा जिसमें संध्या शांताराम ने जितना क्लासिक नृत्य किया था शायद इतनी मधुर लय ताल और थिरकन फिर कभी देखने को ना मिली …. संध्या शांताराम नहीं रहीं …. ‘पंख होते तो उड़ आती रे और हां होली पर अक्सर आपको नवरंग फिल्म का ये गीत सुनने और देखने को जरूर मिलता है ‘अरे जा रे नटखट’ कितना बेहतरीन नृत्य … ‘नवरंग’ का ही आधा है चंद्रमा रात आधी सिर पर मटके रखकर वो इतना खूबसूरत नृत्य उफ्फ… जैसे किसी चित्रकार का पोस्टर यादों पर चस्पा हो जाता है….कौन भूल सकता है संध्या शांताराम को. हिंदी और मराठी सिनेमा की मशहूर दिग्गज अभिनेत्री और महान फिल्मकार वी. शांताराम की पत्नी संध्या शांताराम का 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से पूरे फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। शास्त्रीय नृत्य और दमदार अभिनय के लिए पहचानी जाने वाली संध्या ने भारतीय सिनेमा में अमिट छाप छोड़ी है।

Sandhya Shantaram का वास्तविक नाम विजया देशमुख था

Sandhya Shantaram का अंतिम संस्कार शनिवार को मुंबई के शिवाजी पार्क स्थित वैकुंठ धाम में किया गया।महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने भारतीय सिनेमा और नृत्य में उनके योगदान को याद करते हुए अनुभवी कलाकार को श्रद्धांजलि अर्पित की।संध्या शांताराम का वास्तविक नाम विजया देशमुख था। उनकी खोज 1951 में वी. शांताराम ने अपनी फिल्म ‘अमर भूपाली’ के दौरान की थी। उन्हें हिंदी सिनेमा में असली पहचान 1950 और 60 के दशक में उनके पति द्वारा निर्देशित फिल्मों से मिली। उनकी प्रमुख फिल्में ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘दो आँखें बारह हाथ’ और ‘नवरंग’ हैं। ‘झनक झनक पायल बाजे’ (1955) के लिए उन्होंने विशेष रूप से नृत्य प्रशिक्षण लिया, जिसके बाद उन्हें एक कुशल नृत्यांगना के रूप में ख्याति मिली।

हालांकि, संध्या को सबसे ज्यादा याद उनकी दो कल्ट फिल्मों के लिए किया जाता है। हिंदी सिनेमा में ‘नवरंग’ (1959) का होली गीत ‘अरे जा रे हट नटखट’ आज भी एक क्लासिक है। इस गाने में उन्होंने असली हाथी और घोड़ों के बीच बिना किसी डर के साहसिक नृत्य किया था, जो उनके समर्पण को दर्शाता है। वहीं, मराठी फिल्म ‘पिंजरा’ (1972) में उनकी संवेदनशील भूमिका को मराठी सिनेमा की धरोहर माना जाता है, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था।

वी. शांताराम के साथ उनकी साझेदारी सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक रचनात्मक क्रिएटिव पार्टनरशिप थी जिसने भारतीय सिनेमा को कई सामाजिक संदेश वाली उत्कृष्ट कलाकृतियाँ दीं। अपने पूरे करियर में, उन्होंने कला और संस्कृति को प्राथमिकता दी। उनके जाने से भारतीय सिनेमा ने एक बहुमुखी कलाकार खो दिया है।

PHOTO CREDIT – ULTRA MUSIC / SCREEN SHOT CREATION/google

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