सेवानिवृत्ति के रंग
अरुणा मनवर
यूँ ही नहीं सेवा निवृत्त हुए हैं आज,
ऑफिस की मिट्टी में रचे-बसे हैं हम और हर साँस।
देखी है गर्मी, बरसात और बारिश की वो बूँदें,
जिनसे उठती थी सोंधी खुशबू, भर देती थी रोम-रोम।
याद है वो सुबह की भागमभाग, ऑफिस की राह,
मिट्टी की खुशबू में घुली, कर्तव्य की हर चाह।
ऑफिस के गलियारों में गूँजती अपनों की बात,
प्यार भरी मुस्कानें, कभी अनबन की भी रात।
सेवानिवृत्ति के रंग इमारत के इन रंगों में भी अपनापन समाना था
ऑफिस की कुर्सी, वो टेबल अपना ठिकाना था,
इमारत के इन रंगों में भी अपनापन समाना था।
एक दूजे के सुख-दुख में शामिल हर साथी,
हँसी-ठिठोली, कभी गुस्से की भी बहती थी थाती।
गवाह है घर की दहलीज से रखा वो पहला कदम,
ऑफिस के उस कोने का, जहाँ साधा था हमने दम।
अपनी मेहनत, लगन से सींचा विभाग का हर धरम
यूँ ही नहीं सेवा निवृत्त हुए हैं आज, ये जीवन नहीं है अभी भी कम।
कल फिर जब सुबह होगी, चिड़िया चहकेंगी ज़रूर,
पौधों में कोंपलें कुलबुलाएंगी, भरेंगी नयी ऊर्जा और सुरूर
मुरझाए फूल भी खिलेंगे, नई कोपलें फूटेंगी हर ओर,
घड़ी की टिक-टिक कानों में अभी चिंता के गीत गाएगी
बस नहीं होगा तो वो भीना-भीना सा डर,
सुबह जल्दी उठने का, जल्दी नहाने का अब कहाँ है पहर?
थोड़ा बहुत नाश्ता करके, ऑफिस जल्दी जाने की रफ़्तार,
फिर मीटिंग में जाने का वो बंधा-बंधाया फॉर्मूला ।
बस नहीं होगा तो दफ्तर के कामों से देर से घर लौटना,
कभी छुट्टी के दिन भी फ़ाइलें लेकर आना और कर्तव्य और निष्ठा निभाना
हर हुक्म पर ‘जी सर’ का वो रटा-रटाया गाना,
ऑडिट के सवालों में बेवजह फँस जाने का अफ़साना।
चिंता तबादला रुकवाने की, घर के पास जाने की वो आस,
बस नहीं होगा तो वो भीना-भीना सा डर, छूटेगी ये रास।
यूँ ही नहीं सेवानिवृत्त हुए हैं आज, देखा है हर विकास।
सेवानिवृत्ति के रंग जीवन में घुली रहे शुभकामना
,,,,,,,,,,, हम सभी,
आपके ममतामयी भाव हृदय में सदा रहेंगे व्याप्त,
कर्तव्य निष्ठा, सरल सौम्यता, यही तो था आपका आप्त।
लंबी उम्र, स्वस्थ तन-मन रहे, ईश्वर से यही है कामना,
सरगम के साथ स्वरों सा जीवन में घुली रहे शुभकामना।
हम सब यही कामना करते हैं,
आभार



