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Uniform Civil Code ,UCC क्यों जरूरी है – जानिए

बेटी की पढ़ाई तो पति की मौत के बाद ही छूट गई थी

ज्योती कुमारी,एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
Uniform Civil Code मुस्लिम लॉ के अनुसार पुत्र अगर पिता से पहले मर जाए तो पिता के मरने के बाद उसकी संपत्ति में और पैतृक संपत्ति में उस पुत्र के उत्तराधिकारियों का कोई अधिकार नहीं होता। कितना महिला विरोधी कानून है यह। भारत में मां बाप भाई बहन शादी तय करते समय ऐसे मालिक बनते हैं जैसे शादी करने वाले सिर्फ कठपुतली हों। उन्हें कोई अक्ल नहीं। इस शादी में उनकी कोई भूमिका नहीं। लेकिन जैसे ही शादी में कोई दिक्कत आती है ज्यादातर लोग कन्नी काट लेते हैं दोनों तरफ के। और अगर मामला पुत्र के असमय मृत्यु का हो तो ज्यादातर सास ससुर बहु को लेकर कैसा रुख रखते हैं यह सबको पता है।

अब अगर पति अच्छा कमाता था और संपत्ति अरज कर गया हो, बैंक बैलेंस और बीमा योजना में इन्वेस्ट कर के गया हो तब तो ठीक वरना पत्नी और बच्चे सड़क पर आ जाते हैं।
मैं उस तबके की बात कर रही हूं जहां ज्यादातर महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती हैं और पढ़ी लिखी भी नहीं होती हैं।
जहां गर्व से लोग कहते हैं, औरत की कमाई खायें, इतने गये गुजरे नहीं हैं
और बाहर निकल कर कमाने वाली औरतें सफाई देती रहती हैं, रोती रहती हैं, क्या करें हम मजबूर हैं वरना कौन इज़्ज़तदार औरत चौखट लांघती है

Uniform Civil Code की जरूरत सबसे ज्यादा ऐसे मामलों में

अगर सास ससुर सहारा देने वाले न हों तो उनके रहते भी और अगर जाने के पहले उन्होंने हिबा वगैरह कर के इंतजाम नहीं किया तो उनके जाने के बाद ऐसी महिलाओं की स्थिति दयनीय हो जाती है और बच्चों का भविष्य अंधकारमय।और अगर ससुर नालायक या पक्षपाती हो तब तो इन महिलाओं और बच्चों का जीवन नरक हो जाता है।ऐसे कई मामले मेरी जानकारी में हैं।दिल्ली में आपको घरेलू सहायिकाओं में जो मुसलमान हैं उनके बीच सैकड़ों ऐसी महिलाओं का उदाहरण आपको मिल जाएगा।

इसलिए जरूरी है UCC सिर्फ़ एक मामला यहां समझिए

दिल्ली में बदरपुर एरिया में सिलाई कढ़ाई का काम खूब होता है। सिलाई करने वालों की कमाई यहाँ अच्छी है और ज्यादातर मकान उन्हीं के हैं। किराएदार भी ज्यादातर इसी पेशे के लोग हैं।बिहार से आकर एक परिवार यहाँ रह रहा था।
बीवी घर संभालती मियां फैक्ट्री। अचानक एक दिन वह गांधीनगर माल का सप्लाई देने जाने में एक्सीडेंट का शिकार हो गया स्पॉट डेथ।बीवी ने फैक्ट्री संभालने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ समझ पाती उसके पहले कारीगर ने अपनी फैक्ट्री शुरू कर दी और जहां से इसका पति आर्डर लेता था वहां से वह लेने लगा। बीवी को कोई तजुर्बा नहीं था सो हाथ पैर मारकर भी कुछ नहीं कर पाई।
बिहार वापस गयी तो ससुराल वालों ने घर में घुसने नहीं दिया। ससुर ने साफ कह दिया, पोता होता तो सोचते। अब हमारे वंश का कोई नहीं तुम्हारे साथ तो यहां तुम्हारी कोई जगह नहीं।
यह मायके गई। कुछ दिन मायके वालों ने कोशिश की ससुर को समझाने की। नहीं माना। कोरोना काल में ससुर की मौत हो गई। तो वह फिर ससुराल गई। ससुराल वालों ने इस बार मारपीट कर भगा दिया और हिस्सा देने से मना कर दिया।
मेरे पास आई। मैंने उसे कानून बताकर हाथ खड़े कर दिए। दूसरे वकील के पास गई। उसने कहा कि जेठ को हिस्सा देना पड़ेगा। औरत के पास कुछ जेवर थे।। बेच कर वकील को पैसे दी। कुछ दिन पहले मुझे रास्ते में मिल गई तो मैं पहचान नहीं पाई। 2021 और अब में बहुत फ़र्क था। वह दो साल में ही बहुत कमजोर और अपनी उम्र से बहुत ज्यादा लग रही थी।
उसने बताया कि तीन डेट में ही केस खत्म हो गया और उसको कुछ नहीं मिला। जज साहब बोले, आपसे सहानुभूति है लेकिन हमारे हाथ कानून से बंधे हुए हैं। दीदी वकील साहब ने वेबकूफ बना दिया। आप खर्रा बोलती हैं लेकिन सही बात बोलती हैं।
जेवर बेचने की बात से भाभी बहुत नाराज़ हो गई और अब भाई भी उसको घर में रखने के लिए तैयार नहीं था। भाभी की नजर उसके ज़ेवरों पर थी। वैसे भी आजकल कितने भाई हैं जो बहन को सहारा देते हैं
कुल मिलाकर परेशान हाल वह दुबारा दिल्ली आ गई। बेटी की पढ़ाई तो पति की मौत के बाद ही छूट गई थी। अब बेटी को एक घर में बच्चे संभालने का काम मिल गया है। यह भी झाड़ू पोछा का काम करती है। बोली गुजारा हो जाता है। कुछ पैसा जमा हो जाए तो बेटी का निकाह कर देंगे दीदी फिर एक देह का क्या है जहां कमाएंगे वहीं खा लेंगे रह लेंगे। किराया बहुत भारी लगता है।

यह सिर्फ़ एक औरत की कहानी नहीं है। नजर घुमाइए। सर्वे कीजिए। एक ढूँढेंगे हजार मिलेगी।विशेष कानून के नाम पर जो महिला विरोधी और अमानवीय कानून विशेषाधिकार के नाम पर मिले हुए हैं उन्हें खत्म करने के लिए जरूरी है UCC

साभार.. Photo – Social Media

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