चंद्रा मनीष
बूढ़ा किरायेदार, बस मरने से पहले..
चला जाऊंगा ..
तुम्हारा घर मंदिर है
अब यहां से कहां जाऊंगा
यूं नहीं कहते इसे देवभूमि ..
यही एहसास बाकी मेरे अंदर
एक मूरत तुम्हारी सान्तवना जैसी..
इसकी पूजा छोड़कर कहां जाऊंगा…
रोज जलाने होते हैं दीप..
चढ़ाने होते हैं फूल…
हमदर्दी से तुम्हारी इस बुढ़ापे में..
जीने की ऊर्जा बाकी है…

बस मरने से पहले ..
इस उमर. में अब कहां जाऊंगा..
ये जो अरुणिमा आ रही है झरोखे से..
इसी ऊष्मा से प्रदीप्त हैं मेरे बचे हुए दिन…
अभी मत निकालो मुझे ..मैं कहां जाऊंगा…
कभी पता भी नहीं चलेगा तुम्हें… चला जाऊंगा…
ताकि तुम देख ना सको.. वो सारी बकवास रिवाजों की तस्वीरें….
हां मिलकर जाऊंगा लेकिन झूठ बोलकर … दोबारा लौटने की बात कह कर…
… बस कुछ दिन और रहने दो.. कर दूंगा किराया पूरा.…
कविता सार
कविता का सार ये है कि… एक पहाड़ी सुरम्य वातावरण में एक बुजुर्ग तन्हा लेखक एक छोटे से कमरे में किराए पर रह रहा है… जो अपनी जिंदगी हल्के फुल्के मामूली लेखन से ..बगैर किसी की दया के जीवन यापन कर रहा है… मगर कभी कबार इस छोटे से मकान का किराया समय से देने में असमर्थता होती है लेकिन वो मकान का किराया हमेशा चुकाने की सामर्थ्य भी रखता है.. पात्र की इसी उधेड़बुन को पिरोने की कोशिश में प्रस्तुत लघु कविता..
Photo – Gemini
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