भरत सिंह चौधरी : शपथ ग्रहण की शान, देवभूमि का सम्मान,धामी कैबिनेट के नए मंत्री
रुद्रप्रयाग विधायक भरत सिंह चौधरी ने संस्कृत भाषा में मंत्री पद की शपथ ग्रहण की
भरत सिंह चौधरी:रुद्रप्रयाग से विधायक भरत सिंह चौधरी शपथ समारोह का सबसे मुख्य आकर्षण रहे,चौधरी ने ग्राम प्रधान से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया है। छात्र राजनीति से निकले चौधरी ने अपनी निष्ठा और कार्यशैली से नेतृत्व का भरोसा जीता है। विशेष बात ये रही कि उन्होंने मंत्री पद की शपथ संस्कृत भाषा में लेकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों का परिचय दिया।
भरत सिंह चौधरी पहली बार उन्हें कैबिनेट मंत्री बनने का अवसर मिला
भरत सिंह चौधरी ने अपनी विद्वता और संस्कृत के प्रति प्रेम दिखाते हुए, देवभाषा में शपथ ग्रहण कर सबको प्रभावित किया।धामी कैबिनेट के नए मंत्री चौधरी की छवि एक सरल, मिलनसार और जमीनी नेता की रही है, जो आम जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं. चौधरी की छवि मिलनसार और जमीनी नेता की रही
अब पहली बार उन्हें कैबिनेट मंत्री बनने का अवसर मिला है, जो उनके लंबे राजनीतिक संघर्ष और जनसेवा का परिणाम माना जा रहा है. स्थानीय स्तर पर उनकी छवि एक सरल, मिलनसार और जमीनी नेता की रही है, जो आम जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं. धामी मंत्रिमंडल के इस विस्तार में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने का भी प्रयास किया गया है. सरकार ने मैदान और पहाड़ दोनों क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई है.

सैन्य अनुशासन और छात्र राजनीति से उपजा एक सशक्त नेतृत्व
उत्तराखंड की राजनीति के मंझे हुए चेहरे भरत सिंह का सफर संघर्ष और समर्पण की एक मिसाल है। चमोली जिले की रानीगढ़ पट्टी के एक छोटे से गाँव गडबू में 1959 को जन्मे भरत सिंह चौधरी को अनुशासन विरासत में मिला। उनके पिता, स्वर्गीय सूबेदार छोटाण सिंह चौधरी, भारतीय सेना में थे, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर साफ दिखाई देता है।
शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
भरत चौधरी की शैक्षिक नींव उनके गृह क्षेत्र में ही पड़ी:
- प्रारंभिक शिक्षा: प्राथमिक विद्यालय, घोलतीर।
- इंटरमीडिएट: राजकीय इंटर कॉलेज (GIC), गौचर।
- उच्च शिक्षा: उन्होंने राजधानी का रुख किया और प्रसिद्ध डीएवी कॉलेज, देहरादून से बीए-एलएलबी (BA-LLB) की डिग्री प्राप्त की।
छात्र राजनीति से सत्ता के गलियारों तक
उनका राजनीतिक सफर किसी बड़े पद से नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर के जन-सरोकारों से शुरू हुआ। उनके सार्वजनिक जीवन के कुछ मुख्य पड़ाव इस प्रकार हैं:
- छात्र राजनीति (1979-1982): देहरादून में पढ़ाई के दौरान वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और संगठन के सक्रिय सदस्य के रूप में अपनी पहचान बनाई।
- सहकारी क्षेत्र (1985): वे साधन सहकारी समिति (मिनी बैंक), नगरासू के अध्यक्ष चुने गए, जहाँ उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करीब से समझा।
- पंचायत स्तर (1988): उन्होंने जमीनी स्तर पर नेतृत्व करते हुए ग्राम पंचायत मरोड़ा के प्रधान के रूप में निर्वाचित होकर अपने विधिवत राजनीतिक करियर की नींव रखी।
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