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किराएदार:कमरा किराए का था, सौदा पहचान का हुआ

इंसानियत आज भी ज़िंदा है

किराएदार:किरायेदार बना भेदभाव, लालच और दलाली के त्रिकोण का शिकार, मुस्लिम पहचान आज भी एक बड़ा सवाल”किरायेदार की पीड़ा: धर्म, दलाली और किराए के नाम पर शोषण बड़े शहरों में किरायेदार होना जितना सामान्य प्रतीत होता है, असल में उतना ही जटिल और अपमानजनक अनुभव बन चुका है। एक ओर मकान मालिकों की कठोर शर्तें हैं, दूसरी ओर दलालों की चालबाज़ मानसिकता और बीच में पिसता है वह इंसान जो केवल एक सम्मानजनक छत की तलाश में होता है। यह कहानी अकेले एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि देश के हजारों-लाखों किरायेदारों की है — और अगर उस किरायेदार का नाम ‘मोहम्मद’ हो, तो मुश्किलें और गहरी हो जाती हैं।मुस्लिम किरायेदारों के लिए शहरों में घर मिलना एक संघर्ष

Suhail Saifi,,,writer, Journalist

किराएदार“माफ कीजिए, हम मुस्लिम को घर नहीं देते

आज भी देश के अनेक महानगरों और विकसित शहरों में मुस्लिम किरायेदारों के सामने सबसे बड़ी दीवार उनका नाम बन चुका है। मकान मालिक बिना झिझक यह कह देता है —
“माफ कीजिए, हम मुस्लिम को घर नहीं देते।”

यह जवाब केवल एक दरवाज़ा बंद नहीं करता, बल्कि पूरे समाज की सोच, उसके छुपे डर और भेदभाव को बेनकाब कर देता है। कई जगहों पर ‘पॉलिसी’ का हवाला दिया जाता है, तो कहीं ‘पड़ोसियों की चिंता’ को कारण बताया जाता है। मुस्लिम किरायेदारों को बताया जाता है कि नॉनवेज खाना मना है, अज़ान की आवाज़ न आए, त्योहारों पर कोई शोर न हो — यानी घर किराए पर नहीं, पहचान पर मिलता है।दलाल: मजबूरी को बाज़ार में बेचने वाला ‘सेतु’

दलाल, जिसे तकनीकी रूप से मकान मालिक और किरायेदार के बीच की सुविधा माना जाता है, अब एक शातिर व्यापारी बन चुका है। उसे न किरायेदार की मजबूरी से सरोकार है, न मकान मालिक की नैतिकता से। वह केवल ‘डील’ देखता है — और हर किरायेदार उसके लिए एक अवसर होता है।

जब किसी मुस्लिम युवक को मकान नहीं मिलता, तो दलाल सामने आता है:
“आपका नाम मोहम्मद है? थोड़ा मुश्किल तो होगा, लेकिन मैं बात कर लूंगा… आपको थोड़ा एक्स्ट्रा देना होगा।”

ऐसे में किरायेदार न केवल मानसिक रूप से अपमानित होता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी शोषित होता है।
दलाल कमीशन के नाम पर एक महीने का किराया लेता है, कई बार “सेटिंग” के नाम पर दोहरा वसूली करता है, और फिर हर 11 महीने में नए किरायेदार के बहाने उसी घर से नया सौदा कर लेता है।

मकान मालिक: सुरक्षा की आड़ में भेदभाव

कई मकान मालिक धर्म, जाति, खानपान, और पारिवारिक स्थिति के आधार पर किरायेदार छांटते हैं।
“अकेले लड़के नहीं”,
“मुसलमानों को नहीं”,
“तलाकशुदा महिला नहीं”,
“नॉनवेज नहीं”,
“बच्चों वाली फैमिली नहीं।”

यह शर्तें अब सामाजिक सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव के प्रतीक बन चुकी हैं। मकान वर्षों से खाली पड़े हों, तब भी किराया मिलने से ज्यादा “अपनी पसंद का किरायेदार” मिलना जरूरी माना जाता है।

किरायेदार: मकान, सम्मान और सुरक्षा — तीनों से वंचित

किरायेदार के लिए घर अब सिर ढकने का स्थान नहीं, बल्कि रोज़ का संघर्ष बन गया है।
उसे रोज़ ये साबित करना पड़ता है कि वह अपराधी नहीं,
उसका नाम कोई खतरा नहीं,
उसकी पहचान कोई बोझ नहीं।

वह एडवांस भी देता है, दलाल को कमीशन भी देता है, हर नियम मानता है,
फिर भी वह सबसे असुरक्षित रहता है —
क्योंकि कोई भी दिन उसके लिए “घर खाली करने की तारीख” बन सकता है।

कानून और प्रशासन की चुप्पी

हालांकि किरायेदारी को लेकर कुछ राज्यों में Model Tenancy Act जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन जमीन पर इनका असर ना के बराबर है।
धर्म, जाति, खानपान या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करने वालों के खिलाफ कोई स्पष्ट, प्रभावी, व्यावहारिक कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है।

दलालों पर नियंत्रण न के बराबर है और समाज की सोच आज भी वर्षों पीछे चल रही है।

निष्कर्ष:

जब मकान पहचान के आधार पर दिए जाएं,
जब दलाल मजबूरी को कमाई का ज़रिया बना लें,
और जब किरायेदार केवल “सहनशीलता की परीक्षा” बनकर रह जाए —
तो सवाल उठना लाज़मी है:

क्या किराया केवल पैसा है?
या फिर अब यह एक इंसान की पहचान, धर्म और स्थिति पर आधारित सौदा बन चुका है?

हर मकान मालिक एक जैसा नहीं होता: उम्मीद की एक खिड़की अब भी खुली है

यह सच है कि कई लोग आज भी धर्म और पहचान के आधार पर किरायेदारों को परखते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि समाज में ऐसे मकान मालिक भी हैं जो सिर्फ इंसानियत को देखते हैं।
“हमें फर्क नहीं पड़ता आप कौन हैं, कैसे हैं — आप अच्छे इंसान हैं, बस इतना काफी है।”
ऐसी सोच रखने वाले मकान मालिक आज भी अनेक किरायेदारों के लिए आशा की किरण बने हुए हैं। वे ना केवल बिना भेदभाव के घर देते हैं, बल्कि मुश्किल घड़ी में किरायेदार के साथ खड़े भी रहते हैं।
इन लोगों की सोच यह साबित करती है कि भले ही समाज के कुछ हिस्सों में पूर्वाग्रह गहराए हुए हों, लेकिन बदलाव की राह पूरी तरह बंद नहीं हुई है। इंसानियत आज भी ज़िंदा है — और यही हमें उम्मीद देती है कि आने वाला कल बेहतर होगा

Photo – Gemini

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