Main Slideकहानी कविता

मसूरी वाली खिड़की…तुम्हारे इंतज़ार में मायूस

मगर जब तुम आओगी मैं जी उठूंगी

Chandra Maneesh

मसूरी वाली खिड़की ये जो तुम अपने देश को छोड़कर दुनिया भर में फिरती हो.. हवाई जहाज से चलती हो ..परायी खुबसूरती पे मरती हो… तुम्हें भी पता है ये तुम्हारी ज़मीन नहीं ..

लेकिन चली जाती हो .. अपने आप से दूर जाने के लिए… कुछ भूलने भुलाने के लिए.. मगर फिर लौट आती हो मायूस…

तुम्हारे बेमन की इन यात्राओं से मैं भी तुम्हारी तरह सूखी नदी हूं.. जैसे तुम्हें भी कोई जी न पाया… बहुत सी रौशनी है मेरे चारो ओर मगर फिर भी चौंधियाता सा अंधेरा…

मेरे क़रीब आते तो हैं सब बहुत से लोग..मैं सभी के लिए बिछ सी जाती हूं ..बस बेमन …

शाम से लेकर रात के उस पहर तक कोई कहता है क्या खूब, बहुत खूब… टिमटिमाती रोशनी को सब आंखों में भरके चले जाते हैं…

मगर कोई मुझसे पूछे स्नेहिल
बगैर मेरे मन के सब मेरे साथ जबरदस्ती होते हैं…

मसूरी वाली खिड़की ,मुझे खुलना पड़ता है

मुझे खुलना पड़ता है शायद इसीलिए कि जब तुम आओ.. तो मैं तुम्हारे लिए बची रहूं तुमसे बतिया सकूं.. तुम्हारी खुश्बू से खुद को आबाद करूं .. तुममें डूब जाऊं.. फिर चाहे मर जाऊं..
बस इक बार तुम्हारा चेहरा तुम्हारी जुल्फें ,,, तुम्हारे हाथ मेरी रुह को भिगोकर मेरे इंतज़ार को मेरा ईनाम दे जाएं…

मैं झूमना चाहती हूं .…तुम्हारे बदन की उस ताज़गी पाकीज़गी में डूबना चाहती हूं …

मैं बेजान सी हूं सभी के लिए….मगर जब तुम आओगी मैं जी उठूंगी …
तुम्हारे आने की बात मैंने अपने पहाड़ों से बता रखी है.. बारिश को भी बोल दिया है ..वो बरसने के लिए बेताब है….हम सब तुमसे लिपटना चाहते हैं … महकना चाहते हैं… तुम्हारी मसूरी वाली खिड़की …

हाथी पांव के पास आना तो बता देना..मै थोड़ा सजना चाहती हूं तुम्हारे प्यार में…

तुम्हारी मसूरी वाली खिड़की …

Photo – Gemini

Read Also – हो जाएगी सुबह…

Related Articles

Back to top button