देहरादून को मिलेगी जाम से मुक्ति: दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर से जुड़ने वाला 12 किमी ग्रीनफील्ड बाईपास निर्माण तेज़

देहरादून | विशेष संवाददाता
राजधानी देहरादून को भीषण ट्रैफिक जाम से बचाने और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई देने के लिए निर्माणाधीन 12 किमी लंबे ग्रीनफील्ड चार-लेन बाईपास का कार्य अब युद्धस्तर पर है। 716 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लगभग 44% कार्य पूरा हो चुका है। एनएचएआई (NHAI) के अनुसार, अप्रैल 2027 तक इस मार्ग को जनता के लिए खोल दिए जाने की प्रबल संभावना है।
परियोजना की मुख्य विशेषताएं एक नज़र में:
| विवरण | जानकारी |
| कुल लंबाई | 12 किलोमीटर (एक्सेस-कंट्रोल्ड) |
| अनुमानित लागत | ₹716 करोड़ |
| वर्तमान स्थिति | 44% निर्माण कार्य पूर्ण |
| डेडलाइन | अप्रैल 2027 |
| डिज़ाइन स्पीड | 100 किमी/घंटा (वन क्षेत्रों में 80 किमी/घंटा) |
शहर के भीतर नहीं, अब बाहर से गुजरेगा ‘ट्रांजिट ट्रैफिक’
यह नया बाईपास झाझरा से शुरू होकर पांवटा साहिब-बल्लूपुर (NH-7) सेक्शन को जोड़ते हुए आशारोड़ी चेक पोस्ट के पास दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर से मिलेगा। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश से आने वाले भारी वाहन देहरादून शहर में प्रवेश किए बिना ही सीधे निकल सकेंगे। इससे सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र और विकासनगर की ओर जाने वाले यात्रियों को भी सुगम मार्ग मिलेगा।
विकास के साथ पर्यावरण का भी रखा गया मान
एनएचएआई ने इस प्रोजेक्ट में ‘इको-फ्रेंडली’ दृष्टिकोण अपनाया है। वन क्षेत्रों को न्यूनतम नुकसान पहुँचाने के लिए सड़क की चौड़ाई (Right of Way) को मात्र 30 मीटर तक सीमित रखा गया है।
वन्यजीव सुरक्षा के लिए विशेष निर्माण:
- ओवरपास: वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए 350 मीटर लंबा व्हीक्युलर ओवरपास (VoOP) और एक कैटल ओवरपास।
- छोटे जीवों का ध्यान: सरीसृप और उभयचर जीवों के लिए 5 विशेष ह्यूम पाइप कल्वर्ट।
- अन्य बुनियादी ढांचा: 7 छोटे पुल और 21 बॉक्स कल्वर्ट का निर्माण।
“यह बाईपास न केवल देहरादून में प्रदूषण और जाम को कम करेगा, बल्कि मसूरी जैसे पर्यटन स्थलों तक पहुंच को आसान बनाकर राज्य की अर्थव्यवस्था और पर्यटन को नई रफ़्तार देगा।”
सुरक्षा और तकनीक का संगम
पूरी सड़क पर फेंसिंग और आधुनिक संकेतक बोर्ड लगाए जा रहे हैं ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष को शून्य किया जा सके। हाई-स्पीड कॉरिडोर होने के बावजूद सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है। आने वाले समय में यह मार्ग उत्तराखंड की शहरी गतिशीलता (Urban Mobility) के लिए ‘लाइफलाइन’ साबित होगा।



